शुक्रवार, 4 जुलाई 2008

हड़ताल के बहाने : छुट्टी

भारत त्योहारों का देश है ,कुछ न कुछ त्यौहार जो हमारी संस्कृति और सभ्यता से जुड़े है हमेशा होते रहे है जिनमे अवकाश की सुविधा भी दी जाती है , लेकिन इन सब के बाद भी हर साल हमारी राजनीतिक पार्टिया ,धार्मिक संगठन ,व्यवसायी कुछ न कुछ मांगो को लेकर हड़ताल करते है और सबसे पहले बंद करते है नौनिहालों के शालाओ को , बच्चे खुश होते है की एक दिन और छुट्टी मिल गई ,लेकिन क्या हमने कभी सोचने की कोशिश की किहम अपने ही बच्चो को शिक्षा से वंचित कर क्या देने जा रहे ,क्या इससे उनके मन मे अच्छी भावना जागेगी ,कई बार तो छोटे छोटे बच्चो को स्कुल बंद करा देने के कारण परेशानी का सामना करना पड़ता है क्योकि उसके अभिभावक उन्हें छोड़ के चले जाते है और बीच मे स्कुल बंद करा दिए जाते है उन्हें वापस जाने मे परेशानी होती है , कई बार तो बंद कराने वाले लोग कक्षा मे घुसकर शिक्षक के साथ बच्चो के सामने बदसलूकी करते है आख़िर इससे क्या संदेश हम देते है, क्या बंद ही मांगो को मनवाने का तरीका है? क्या स्कुल को बंद करवाना जरुरी होता है,क्या हम सबके बच्चे स्कुलो मे नही पढ़ते ? क्यो नही हम स्कुलो को इन सबसे बख्श दे ?

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